Thursday, November 1, 2018

सरदार पटेल और मोदी में है कितनी समानता?

सरदार पटेल से भारतीय जनता पार्टी की सहानुभूति शुरू से रही है. ये सहानुभूति क्यों है, इसका जवाब कई इतिहासकार नेहरू बनाम पटेल की राजनीति के तौर पर देखते हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि सरदार पटेल भी कांग्रेस के ही नेता थे. सरदार पटेल ने गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाए थे. पटेल ने ये भी कहा था कि गांधी की हत्या के बाद आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने मिठाई बाँटी थी.

इतना कुछ होने के बावजूद बीजेपी को सरदार पटेल क्यों लुभाते हैं?

नरेंद्र मोदी सरदार पटेल के गृह राज्य गुजरात के ही हैं और वो पटेल को लेकर काफ़ी मुखर रहते हैं. कई बार पटेल से सहानुभूति जताते हुए नेहरू पर हमला बोल चुके हैं. पीएम मोदी को जब भी नेहरू पर हमला बोलना होता है तो पटेल की तारीफ़ करते हुए बोलते हैं.

मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. तारीख़ थी 20 अक्टूबर 2013. गुजरात में एक समारोह में मोदी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक साथ मंच पर थे. इसी मंच से मोदी ने कहा, ''हर भारतीयों के मन में आज तक कसक है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पटेल नहीं बने. अगर पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो भारत की तस्वीर कुछ और होती.''

मनमोहन सिंह ने उसी मंच से मोदी को जवाब दिया था, ''याद रखना चाहिए कि पटेल भी कांग्रेस के ही नेता थे.''

मोदी अब प्रधानमंत्री हैं और उन्होंने पटेल की ऐसी मूर्ति बनवाई जिससे दुनिया की सारी मूर्तियां छोटी पड़ गईं. लेकिन मोदी जिस पटेल को अपना आदर्श मानते हैं, उनके विचारों से कोई समानता भी है?

मोदी और पटेल के व्यक्तित्व, सोच और दृष्टिकोण में कितनी समानता है?

'मैं कम बोलने वाला आदमी हूं. मैं कम क्यों बोलता हूं? एक सूत्र है जो मैंने सीख लिया है कि मौनं मूर्खस्य भूषणम्. ज़्यादा बोलना अच्छा नहीं है. वो विद्वानों का काम है. लेकिन जो हम बोलें उसी के ऊपर हम न चल सकें तो हमारा बोलना नुकसान कर सकता है. इसलिए भी मैं कम बोलता हूं.'

सरदार पटेल की कही इस बात को यू-ट्यूब पर सुना जा सकता है.

पटेल बहुत ही मृदुभाषी थे. वो कम बोलते थे और करने में ज़्यादा यक़ीन रखते थे. पटेल ने कभी कोई विवादित बयान नहीं दिया. इस कसौटी पर पीएम मोदी को कसा जाए तो कई चीज़ें विषम दिखती हैं. पीएम मोदी के कई विवादित बयान हैं और वो लंबे भाषण देने के लिए जाने जाते हैं.

गांधीवादी विचारक कुमार प्रशांत कहते हैं, ''सरदार पटेल ठोस बात करते थे. वो लंबे भाषणों में बिल्कुल यक़ीन नहीं करते थे.''

एक तरफ सरदार पटेल मौनं मूर्खस्य भूषणम्की बात करते थे. लेकिन दूसरी तरफ पीएम मोदी अपने लंबे भाषणों के लिए जाने जाते रहे हैं.

ऐसे कई मौक़े रहे, जब मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्रियों से लंबे भाषण दिए. लाल किले से दिए घंटों लंबे भाषण आपको याद ही होंगे.

इन भाषणों के दौरान मोदी से कुछ भूल भी होती रही हैं. तक्षशिला को बिहार का हिस्सा बताने से लेकर सिकंदर के बिहार आने की बात तक.... मोदी की ऐसी कई चूकें सोशल मीडिया पर चर्चा में रहीं.

मोदी भले ही नेहरू पर आक्रामक रहते हैं लेकिन पटेल उनका सम्मान करते थे. इसकी झलक उन ख़तों में मिलती है, जिसे इन दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को भेजा था.

एक अगस्त 1947

नेहरू ने पटेल को ख़त लिखा, "कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना ज़रूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ. इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं."

3 अगस्त 1947

सरदार पटेल ने नेहरू को जवाब दिया, ''आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद. एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 साल की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता. आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी. आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है. हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है. आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं.''

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